नयनाभिराम भगवान श्रीबालकराम
त्रेतायुग में जब भगवान श्रीराम प्रगट हुए तो मां कौसल्या अपने शिशु का रूप निहारती रह गईं और गोस्वामी तुलसीदास जी कह उठे— भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी । हरषित महतारी सुनि मन हारी अद्भुत रूप...
View Articleभगवान श्रीकृष्ण और कमल
भगवान श्रीकृष्ण और कमल का सम्बन्ध अटूट है । कुंती जी भगवान श्रीकृष्ण की बहुत सुंदर वंदना करते हुए कहती हैं— नम: पंकजनाभाय नम: पंकजमालिने । नम: पंकजनेत्राय नमस्ते पंकजाड़्घ्रये ।। (श्रीमद्भागवत)...
View Articleठाकुर बांकेबिहारी जी के स्वरूप की विशेषता
श्रीवृंदावन धाम में विराजित ठाकुर बांकेबिहारी, जिनकी हर बात है निराली; जैसा उनका नाम निराला; वैसा ही उनका रूप-स्वरूप भी अत्यंत निराला है । स्वामी हरिदास जी श्रीराधा की प्रिय ललिता सखी के अवतार माने...
View Articleअयोध्या का राजसिंहासन और रावण
अयोध्या के चक्रवर्ती सम्राट रघु ने ही ‘रघुकुल’ या ‘रघुवंश’ की नींव रखी थी । रघुकुल अपने सत्य, तप, मर्यादा, वचन पालन, चरित्र व शौर्य के लिए जाना जाता है । इसी वंश में भागीरथ, अंबरीष, दिलीप, रघु, दशरथ...
View Articleभगवान विट्ठल और संत तुकाराम
‘भक्त के हृदय की करुण पुकार कभी व्यर्थ नहीं जाती, वह चाहे कितनी भी धीमी क्यों न हो, त्रिभुवन को भेदकर वह भगवान के कानों में प्रवेश कर ही जाती है और भगवान के हृदय को उसी क्षण द्रवित कर देती है ।’ ऐसा...
View Articleभगवान से विमुख होने पर किसी को सुख नहीं मिला
भगवान की प्रत्येक लीला मनुष्य पर कृपा करने के लिए ही होती हैं । ऐसा ही एक प्रसंग है श्रीराधा रानी की ‘कोप लीला’ । श्रीकृष्ण व राधारानी के श्रीअंग से प्रकट हुई गंगा उनका अंश व उन्हीं का स्वरूप है ।...
View Articleराधा तू बड़भागिनी कौन तपस्या कीन
राधा तू बड़भागिनी कौन तपस्या कीन । तीन लोक तारनतरन सो तेरे आधीन ।। संसार में श्रीराधा जैसी भाग्यवान कोई स्त्री नहीं है, जिनके पति तीनों लोकों के स्वामी श्रीकृष्ण सदैव उनके कन्धे पर गलबहियां डाले रहते...
View Articleभगवान श्रीकृष्ण और चंद्रावली सखी
भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को ‘कलंक चतुर्थी’ भी कहते है; इस दिन चन्द्रदर्शन निषेध है । इस दिन चन्द्रमा के दर्शन से झूठा कलंक, चोरी और व्यभिचार का पाप लगता है । एक बार श्रीकृष्ण ने नारद जी से कहा–’हे...
View Articleसती और पार्वती जी के अज्ञानता के अभिनय से हुआ श्रीरामचरितमानस का अवतरण
रावण द्वारा सीता जी का हरण कर लेने के बाद भगवान राम शोक का अभिनय करने लगे । वे पेड़-पत्तों और पशु-पक्षियों से सीता जी का पता पूछ रहे थे । उसी अवसर पर भगवान शंकर सती जी के साथ दण्डकारण्य में पधारे और...
View Articleभगवान का भोग ग्रहण करना
किसी गांव में एक दरिद्र ब्राह्मण बड़े प्रेम और श्रद्धा से अपने लड्डूगोपाल की सेवा करते थे । उनके पास धन नहीं था । घर में जो रूखा-सूखा भात का भोजन बनता, वही अपने ठाकुर जी को भोग लगा कर वे स्वयं ग्रहण...
View Article‘राम’ नाम लिखे तुलसीपत्र की महिमा
तुलसी वृक्ष न मानिये, गाय न मानिये ढोर । ब्राह्मण मनुज न मानिये, तीनों नन्दकिशोर ।। इस पद का भाव यह है कि तुलसी केवल एक वृक्ष या पौधा नहीं है; वे भगवान की पटरानी हैं । गाय केवल पशु नहीं है; वरन् गोलोक...
View Articleगुरु कृपा रूपी रक्षा कवच
संसार में जन्म लेने वाला कोई भी व्यक्ति ऐसा नहीं है, जिसे भगवान की माया ने पागल न किया हो । इससे बचने के लिए किसी संत के चरणों की शरण या सद्गुरु का सहारा लेना आवश्यक होता है । सद्गुरु की सेवा से जो...
View Articleलक्ष्मी-प्रेम या भगवान से प्रेम
एक दिन श्रीहरिप्रिया लक्ष्मी जी ने अपने पति वैकुण्ठपति भगवान विष्णु से व्यंग्य करते हुए कहा—‘नाथ ! संसार में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति हो जो लक्ष्मी की कामना न करता हो । राजा, रंक, छोटे, बड़े सभी चाहते...
View Articleआसुंओं का महत्व
लीला-पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की प्रत्येक लीला संसार को किसी-न-किसी ज्ञान से अवगत कराती है । ऐसी एक लीला है जिसमें भगवान ने अपनी प्राप्ति के दो साधनों से संसार को अवगत कराया है—१. भगवान के विरह में...
View Articleएकाम्रेश्वर जहां बालुका-लिंग में विराजते हैं शिव
एकाम्रेश्वर या एकाम्बरेश्वर का क्षिति-लिंग दक्षिण भारत के शिवकांची में स्थित है । एकाम्रेश्वर-लिंग पार्वती जी द्वारा निर्मित बालुका-लिंग है, जिसकी वे पूजा करती थीं । एकाम्रेश्वर-लिंग के प्राकट्य की...
View Articleआदि शंकराचार्य जी द्वारा भगवान जगन्नाथ की रत्नवेदी पर पुनर्स्थापना
एक बार जगद्गुरु आदि शंकराचार्य अपने आश्रम में अखण्ड आनंद-समाधि में लीन थे, सहसा उनका शरीर अपूर्व सिहरन से व मस्तिष्क नीले बादलों की-सी दिव्य प्रभा से भर गया । उनके नेत्रों में एक अलौकिक गोलाकार...
View Articleभगवान की पूजा या सेवा
सामान्य भाषा में भगवान की ‘सेवा’ और ‘पूजा’ दोनों का समान अर्थ माना जाता है; लेकिन वैष्णव आचार्यों ने भाव के अनुसार इनमें बहुत बड़ा अंतर माना है । जानते हैं, भगवान की सेवा और पूजा में अंतर— ▪️ जहां...
View Articleसीता जी की खोज में प्रभु श्रीराम की रुदन लीला
संतों ने जगज्जननी माता सीता के तीन स्वरूप बताए हैं—१. सत्वमय, २. राजसी और ३. तामसी । सीता जी का शुद्ध सत्वमय स्वरूप श्रीराम जी के साथ सदा ही रहता है । उनका कभी राम जी से वियोग हो ही नहीं सकता; क्योंकि...
View Articleभगवान श्रीकृष्ण का चतुर्भुज रूप
भगवान श्रीकृष्ण ने अपने अवतार में साधारण मानव के रूप में लीला की; इसलिए मनुष्यों की तरह उनका द्विभुज रूप देखने को मिलता है । किंतु श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय में उन्होंने अपने चतुर्भुज रूप...
View Articleभगवान के स्वरूप का ध्यान क्यों करना चाहिए ?
भगवान के स्वरूप का ध्यान क्यों करना चाहिए ? यह जानने से पहले यह जानना अत्यंत आवश्यक है कि भगवान का स्वरूप कैसा होता है ? क्या वह केवल सुंदर होता है या फिर सुंदरता की सीमा से परे लोकोत्तर (divine) होता...
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